16th June 2021

दुर्गा भाभी – बबिता बसाक

दुर्गा भाभी

आजादी की लड़ाई में भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद व यशपाल जैसे क्रांतिकारियों का नाम जब भी आयेगा तब तब देश इस महिला को भी जरुर याद करेगा। क्रांतिकारियों भाइयों के लिए सदैव तत्पर रहने वाली और हर संभव सहयोग करने वाली इस क्रान्तिकारी सहयोगी महिला को सभी दुर्गा भाभी कहकर संबोधित करते थे जिसके कारण उनकी पहचान बनी दुर्गा भाभी या यों कहें वे इसी नाम से जानी भी गईं।
दुर्गा भाभी का वास्तविक नाम था दुर्गावती बोहरा, जिन्होंने अंग्रेजो के एक मिशन को फेल करने के लिए भेष बदला और सरदार भगत सिंह की पत्नी बनकर अपने 3 साल के पुत्र के साथ 18 दिसम्बर 1928 को कलकत्ता मेल से यात्रा की थी। उस यात्रा में उनके साथ राजगुरु ने सर्वेन्ट्स कम्पार्टमेंट मेंऔर चंद्रशेखर आजाद ने एक गवैये का भेष बदलकर उनके साथ यात्रा की थी।
7 अक्टूबर 1902 को शाहजादपुर गांव (वर्तमान में कौशाम्बी जिले) में हुआ था। 10 साल की उम्र में उनका विवाह हुआ लाहौर के भगवती चरण बोहरा से। बोहरा जी क्रांतिकारी विचारों वाले व्यक्ति थे साथ ही क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव भी थे। अन्य क्रांतिकारियों की भांति वे भी भारत को स्वतंत्र देखना चाहते थे।

दुर्गावती का दोनों ओर से परिवार सुसम्पन्न था। कहा जाता है विवाह के समय उन्हें 40,000 और 5,000 रु0 मिले थे, परंतु इस दंपत्ति ने उनका प्रयोग देश हित के लिए क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर किया। मार्च 1926 में भगवती चरण बोहरा व भगत सिंह ने संयुक्त रुप मे नौजवान भारत सभा का प्रारुप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। अनगिनत नौजवानों ने अपने प्राणों की बलि देने और देश को आजाद कराने में उस शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किये। तब भगत सिंह और भगवतीचरण बोहरा ने अपने रक्त से उस शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किये थे।
दुर्गाभाभी ने देश को आजाद कराने और भगतसिंह के समाजवादी सपने को पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व जीवन समर्पित कर दिया। 1927 में लाला जी मृत्यु का बदला लेने के लिए लाहौर में जो बैठक बुलाई गई थी उसकी अध्यक्षता दुर्गाभाभी ने की थी। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर बम बनाने और उसका परीक्षण करने के दौरान बोहरा जी शहीद हो गये।
गोद में अबोध बालक शची और पति का बलिदान उन्हें विचलित नहीं कर सका। वे पूरी तरह क्रान्तिकारियो के साथ देश की आजादी के लिए उनके साथ सक्रिय हो गई।
दुर्गा भाभी एक निडर व बहादुर महिला थी। पिस्तौल चलाने की विधिवत ट्रेनिंग उन्होंने लाहौर व कानपुर से प्राप्त की थी। कहा जाता है चंद्रशेखर आजाद ने जिस पिस्तौल से स्वयं को गोली मारी थी वे दुर्गा भाभी ने ही उन्हें दी थी। वे बहुत बहादुर थी राजस्थान से हथियार लाती और ले जाती थीं । स्वयं नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी उनसे हथियार मंगवाते थे।


निडर दुर्गा भाभी ने लाला लालपत राय की लाठियों से हुई मृत्यु का बदला लेने के लिए 9 अक्टूबर 1930 को गवर्नर हैली पर गोली चलाई थीं लेकिन वे बच गये। परंतु उनकी गोली से कमिश्नर टेलर जख्मी हो गये और अंग्रेज सरकार तभी से दुर्गाभाभी के पीछे पड़ गई थी। क्रान्तिकारियांे के एक एक करके शहीद होने के बाद वे पूरी तरह से अकेली हो गई। अपने पुत्र शचीन्द्र को शिक्षित कराने के लिए वे दिल्ली आ गई । उसके बाद वे लाहौर भी गई। अंग्रेज शासन ने उन्हें तीन साल तक नजरबंद रखा।
दुर्गा भाभी एक सुशिक्षित महिला थीं। 1922 में जब बोहरा जी ने नेशनल कॉलेज से बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की तब दुर्गा भाभी ने प्रभाकर की डिग्री हासिल की। साल 1935 में गाजियाबाद में प्यारेलाल कन्या विद्यालय में बतौर शिक्षिका उन्होंने नौकरी कर ली। परंतु 1937 में नौकरी छोड़ दी। साल 1940 में वे लखनऊ आई और सदर कैंट में 5 विद्यार्थियों के साथ मांटेसरी स्कूल की स्थापना की। आज भी ये स्कूल मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से मौजूद है। 14 अक्टूबर 1999 को वे हम सबको हमेशा के लिए छोड़कर चली गईं।

. बबिता बसाक

 

 

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